6:55 صباحًا الخميس 13 ديسمبر، 2018

وفى مجلس المستهئزين



صور وفى مجلس المستهئزين

مزمور 1 – تفسير سفر المزامير
هذا المزمور يضع امامنا طريق الموت وطريق الحياه،

البركة واللعنه،

ويتركنا احرارا ان نختار.

فهو يتحدث عن سعادة الرجل الصالح وشقاوه الشرير وتعاسته.

ايه 1):

“طوبى للرجل الذي لم يسلك في مشوره الاشرار وفي طريق الخطاه لم يقف وفي مجلس المستهزئين لم يجلس.”

طوبى للرجل = قالها بالمفرد فليس صالحا سوى المسيح وحده.

ونلاحظ التدرج

لا يسلك في مشوره الاشرار = اي يفكر في طريقهم ويستحسنه ويعطي ظهره لله وهذه مخاطره.

ولا يقف في طريق الخطاه = هنا حدث استحسان للشر ووجد الانسان لذه،

فبدا يجاري الاشرار ويخطئ.

ونلاحظ قوله طريق الخطاه،

ونقارن هذا بان المسيح هو الطريق والحياة فالمسيح طريق الابرار،

واي طريق سواه فهو طريق الشيطان،

طريق الموت واللعنه.

لا يجلس في مجلس المستهزئين = هنا نجد الاستسلام لطريق الشر،

وصار الاشرار رفقاء لهذا الانسان،

والمستهزئين هم من يستهزئون بالامور المقدسه.

هنا استمرار ارادي في الشر.

 

ايه 2):

“لكن في ناموس الرب مسرته وفي ناموسه يلهج نهارا وليلا.”

قارن مع “خبات كلامك في قلبي لكي لا اخطئ اليك”،

فكلمه الله تحصن المسيحي من السقوط يش8:1).

وقوله نهارا وليلا = يشير لكل فترات الحياه،

الليل والنهار ايام الفرح وايام الحزن،

ايام الانتصار على الخطيه وايام السقوط.

 

ايه 3):

“فيكون كشجره مغروسه عند مجاري المياه.

التي تعطي ثمرها في اوانه.

وورقها لا يذبل.

وكل ما يصنعه ينجح.”

كشجره مغروسه على مجاري المياه = راجع مت 13:

31-32 مجاري المياه اشاره للروح القدس يو37:7-39 .



هذه المياه تجري كالعصاره وتصل الى كل الاغصان والاوراق.

وقوله مجاري يشير الى انها مياه حيه جاريه تحمل معها الحياه.

والشجره المثمره هي سبب بهجه لكل انسان وحيوان،

ثمارها تشبع ويستفاد من ظلها.

ونلاحظ ان المسيح هو شجره الحياة رؤ7:2 تعطي ثمرها في اوانه = قارن مع ثمار الروح القدس غل22:5).

والمسيح لعن التينه غير المثمره.

وورقها لا ينتثر = لان غذاءها ياتيها في حينه.

والمتعبين ياتون ليستظلوا بهذه الشجره.

كل ما يصنعه ينجح = قارن مع “استطيع كل شيء في المسيح الذي يقويني”.

فمن يثبت في المسيح يكون له نجاح في كل اموره ماديه وروحيه فالله بارك ليوسف في كل ما عمله).

 

ايه 4):

“ليس كذلك الاشرار لكنهم كالعصافه التي تذريها الريح.”

العصافه= هذا وصف الاشرار،

فهم عكس الابرار،

لا يستمتعون بالمياه الجاريه فورق الشجره يذبل ويصير عصافه تحمله الريح الخفيفه اي التجارب البسيطة التي ينساق وراءها الشرير= التي تذريها الريح.

تصير حياتهم بلا معني فهم كعصافه حملتها الريح.

 

ايه 5):

“لذلك لا تقوم الاشرار في الدين ولا الخطاه في جماعة الابرار.”

لا تقوم الاشرار في الدين = لا يستطيعون ان يقوموا للدفاع عن انفسهم،

ولا يكون لهم قيام الوجود الدائم في حضره الله،

اذ “يقولون للجبال غطينا وللاكام اسقطي علينا من وجه الجالس على العرش” رؤ16:6،

17).

الدين = قضاء الله يوم الدينونه يو29:5).

 

ايه 6):

“لان الرب يعلم طريق الابرار.

اما طريق الاشرار فتهلك.”

الرب يعلم طريق الابرار = العلم والمعرفه هنا هما معرفه الفرح والسرور والموافقه.

طريق الاشرار فتهلك = الله يمهلهم فان لم يتوبوا يرذلهم ويطردهم من حضرته.

 

هذا المزمور نرنمه في صلاه باكر ونحن نذكر قيامه المسيح من الاموات لنسال الله ان يعطينا الحياة المطوبه كنعمه الهيه قبل ان نبدا حياتنا اليوميه.

هذا المزمور يذكرنا بان الله خلق ادم اولا في صورة الكمال ولما سقط اتى المسيح ادم الاخير الكامل ليكملنا.

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